Thursday, 18 September 2014

हिन्द- एक महासागर

इस तलक महफूज़ रखे..
हुए है ये गुलिस्तां मुझे..
कहाँ जाना है कहाँ जा रहा हूँ..
इसकी सीमा में ना डर है मुझे..
ना वफ़ा का डर है न दगा का..
इससे बेशुमार मोहब्बत करने का गज़ब ही असर है..
ये चाहता नही है मुझसे कुछ भी सर्वेश..
स्वेच्छा से खुद को लुटाये जा रहा है..
अब कब तक मुझे इससे मोहब्बत ना होती..
ये हिन्दुस्तान जनम जन्मांतर से एक तरफ़ा प्यार निभाए जा रहा है..

बहुत से इसके अपने लांग गए सीमा..
उन्हें नींद नहीं आती, नशे में जुटे है..
कोई इसे छोड़ कर बुरा बता रहा है तो कोई पिछड़ा..
इस सबकी उपेक्षा कर ये हिन्द उनसे जुड़े जा रहा है..
जो एक बार छोड़ गया, दोबारा भी छोड़ जायेगा..
ये जानकार भी दामन फैला रखा है पुकारे जा रहा है..
ये चाहता नही है मुझे खुद से दूर सर्वेश..
हवा और समुद्र के भाव से घबराये जा रहा है..
अब कब तक मुझे इससे मोहब्बत ना होती..
ये हिन्दुस्तान जनम जन्मांतर से एक तरफ़ा प्यार निभाए जा रहा है..

हवाएं भी अब मुझे छूने से है डरती..
कहती है ये हिमालय का माँ जाया भाई हुआ है..
हिन्द ने विरासत में संस्कार और संस्कृति है दी..
बचपन से हिन्दुस्तानी कह कर अपना नाम दिए जा रहा है..
बलिदान न भुला योगदान न भुला..
भुला तो भुला बस अपनों की गदारी को भुला..
बड़पन तो देखो जो इसके अपने इसे बुरा कहते है..
ये उन्हें हर रोज अपनी मिटटी के गुण दिए जा रहा है..
अब कब तक मुझे इससे मोहब्बत ना होती..
ये हिन्दुस्तान जनम जन्मांतर से एक तरफ़ा प्यार निभाए जा रहा है..

हे हिन्द तेरा स्वयं को मारकर मुझे ज़िन्दगी देना..
कभी न भूलूंगा वादा है मेरा..
है वादा मेरा मेरी भारत माता..
जीऊंगा मरूँगा बस तिरंगे की खातिर..
में बीज हु तेरा, पानी तूने ही दिया है..
फ़सल बना तो तेरे लिए बनूँगा..
फ़सल कटा तो तेरे लिए काटूँगा..
अगर व्यर्थ गिरा..
तो वादा है मेरा, तेरी ज़मीन से परे ना गिरूँगा..

जय हिन्द!! जय हिन्द!!

आज़ाद सत्यज़ादा







 

No comments:

Post a Comment