Thursday, 28 August 2014

प्यास : एक संघर्ष

वो अलग शक्श था..
उसकी आँखों में प्यास नज़र आ रही थी..
पानी मिलेगा कुछ एसी आस नज़र आ रही थी..
एक बड़े दिल वाला उसे रोटी दे रहा था..
अब हाथो में रोटी थी पर ज़ेहन में प्यास..
जानता था प्यास भुझाने पर ही रोटी का आनंद उठा पाएगा..
दूर दरास एक मटका दिखा..
प्यास ने एक एक कदम को सहारा दिया..
किस्मत का फेर तो देखो..
मटका खाली और नीचे लिखा था प्यास भुजालो प्यारे..
प्यास ने मेहनती बना दिया ज़मीन खोदने लगा..
रुत सावन की थी, मेघ भरे थे पानी से..
कंठ सूखे थे संघर्ष के..
वो तीज का बादल बरस गया..
फैला लिए हाथ प्यासे ने..
एक एक बूंद गले से उतरकर आनंद दिला रही थी..
नमकीन लगी कुछ बूंदे..
आँखों के अम्बर से जो आ रही थी..
प्यास कभी नही भुजती है..
तो क्या, शांत पल के लिए हो जाये..
रोज मेघ कोन बरसाए..
अब तो नमकीन बूंद जानी पहचानी हो जाये..
तो शायद प्यास संघर्ष में खो जाये..